bnp news desk । Education Monitoring यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन मानिटरिंग (जीईएम) टीम की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के आधे से अधिक देशों (लगभग 58 प्रतिशत) ने स्कूलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लगा दिया है। यह आंकड़ा केवल एक नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और गिरते शैक्षणिक स्तर को लेकर वैश्विक स्तर पर मची बेचैनी का प्रमाण है।
तेजी से बढ़ता प्रतिबंधों का दायरा
Education Monitoring रिपोर्ट के अनुसार, जून 2023 तक केवल 24 प्रतिशत देशों में फोन बैन थे, लेकिन मार्च 2026 तक यह संख्या बढ़कर 58 प्रतिशत हो गई है। इसका मतलब है कि 114 शिक्षा प्रणालियों ने अब अपने यहां स्कूलों में फोन को ‘नो-एंट्री’ दे दी है। हाल के महीनों में बोलीविया, मालदीव, क्रोएशिया और जार्जिया जैसे देशों ने इस सूची में अपना नाम जोड़ा है।
जीईएम टीम के एक वरिष्ठ सदस्य ने कहा, “यह विस्तार कक्षाओं में कम होती एकाग्रता, साइबर बुलिंग और बच्चों पर डिजिटल वातावरण के बढ़ते नकारात्मक प्रभाव के प्रति बढ़ती चिंताओं को दर्शाता है।” फ्रांस जैसे देश, जिन्होंने प्राथमिक स्तर पर पहले ही प्रतिबंध लगा दिया था, अब और कड़े कानूनों पर विचार कर रहे हैं। वहीं अमेरिका में भले ही कोई राष्ट्रीय कानून न हो, लेकिन 39 राज्यों ने अपने स्तर पर इसे विनियमित करना शुरू कर दिया है। Education Monitoring
इंटरनेट मीडिया व लड़कियों का मानसिक स्वास्थ्य
रिपोर्ट का सबसे भयावह पहलू इंटरनेट मीडिया का किशोरों, विशेषकर लड़कियों पर पड़ने वाला असर है। यूनेस्को का कहना है कि इंटरनेट मीडिया के कारण लड़कियों में ईटिंग डिसआर्डर (खाने से संबंधित विकार) होने की संभावना लड़कों की तुलना में दोगुनी है।
फेसबुक के अपने शोध ने स्वीकार किया है कि इंस्टाग्राम इस्तेमाल करने वाली 32 प्रतिशत किशोरियां अपने शरीर की बनावट (बाडी इमेज) को लेकर हीन भावना महसूस करती हैं।
टिकटाक का एल्गोरिदम तो और भी घातक है, जो हर 39 सेकंड में बाडी इमेज कंटेंट और हर आठ मिनट में ईटिंग डिसआर्डर से जुड़ा कंटेंट किशोरों के सामने परोसता है।
संतुलन की तलाश : प्रतिबंध या नियमन
जहां कोलंबिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देश स्कूलों को नीति बनाने की स्वायत्तता दे रहे हैं, वहीं आस्ट्रेलिया, स्पेन और पुर्तगाल बच्चों के लिए इंटरनेट मीडिया के उपयोग को ही सीमित करने हेतु विधायी कदम उठा रहे हैं।
रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि शैक्षणिक सफलता के लिए भावनात्मक स्वास्थ्य अनिवार्य है, और 10 वर्ष की उम्र से इंटरनेट मीडिया का बढ़ता आकर्षण भविष्य की सामाजिक-भावनात्मक समस्याओं की जड़ बन रहा है।
















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