BNP NEWS DESK। Masannath Temple काशी की अनूठी परंपराओं में से एक महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर सजने वाला राग-विराग का मेला इस बार निर्माण कार्यों के चलते मसाननाथ मंदिर में आयोजित किया जाएगा। मोक्ष नगरी काशी में गंगा तट स्थित महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर बाबा मसाननाथ का मंदिर है।
Masannath Temple मंदिर का वार्षिक शृंगार महोत्सव वासंतिक नवरात्र की पंचमी से सप्तमी तक मनाया जाता है। पहले दिन पंचमी तिथि में शास्त्रोक्त विधि विधान से बाबा का रुद्राभिषेक व शृंगार पूजन आरती की जाती है। दूसरे दिन षष्ठी तिथि में दोपहर से शाम तक भंडारा रात्रि में भजन संध्या का आयोजन किया जाता है।
तीसरे दिन चैत्र नवरात्र की सप्तमी को राग-विराग का मेला सजता है जहां जलती चिताओं के बीच एक ओर करुण विलाप सिसकियां लेता है तो दूसरी नगर वधुओं की घुंघरुओं की खनक इस नश्वर संसार के कटु सत्य से साक्षात्कार करा रही होती है। लगभग 400 साल पुरानी इस परंपरा के अनुसार नगर वधुएं जलती चिताओं के बीच रात भर नृत्य-जागरण (नृत्यांजलि) करती हैं।
‘राग-विराग का यह मेला’ बाबा मसाननाथ को समर्पित है
महाश्मशान पर होने वाला ‘राग-विराग का यह मेला’ बाबा मसाननाथ को समर्पित है, जिसका उद्देश्य मोक्ष की कामना और अगले जन्म में नगर वधू के जीवन से मुक्ति पाना है लेकिन इस बार यह आयोजन घाट पर चल रहे निर्माण कार्य के चलते नहीं हो सकेगा।
आयोजकों ने इस बाबा मसाननाथ मंदिर के अंदर परिसर में कराने का निर्णय लिया है। हालांकि इस बार मसाने की होली को लेकर उठे शास्त्रीय-अशास्त्रीय परंपरा के विवाद के बीच राग-विराग के मेले पर भी प्रश्नचिह्न लगे थे। Masannath Temple
मंदिर समिति के अध्यक्ष चैनू प्रसाद गुप्ता, महामंत्री बिहारी लाल गुप्ता व मंदिर व्यवस्थापक गुलशन कपूर के अनुसार चूंकि मणिकर्णिका घाट पर नवनिर्माण की वजह से स्थान का अभाव और कई तरफ की समस्या है जिसमें स्थानीय प्रशासन एवं नगर निगम का कोई सहयोग नहीं मिल रहा हैं। इस कारण सभी आयोजन मंदिर प्रांगण में ही होगा। भक्तों से अनुरोध हैं कि वो समय से सुरक्षा का ध्यान रखते हुए ही आएं।
नृत्यांजलि की परंपरा
मणिर्णिका घाट पर विराजित बाबा मसाननाथ को स्वयंभू कहा जाता है। बताते हैं कि जब राजा मानसिंह धर्म नगरी काशी आए तो बाबा मसाननाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। नवीनीकरण कार्य के बाद जब गीत-भजन की परंपरा के निर्वाह की बात आई तो इसके लिए शहर ही क्या बाहर का भी कोई कलाकार आने को तैयार न हुआ। यह जानकारी जब नगरवधुओं को मिली तो राजा मानसिंह तक अपनी सहमति का संदेश डरते-डरते भिजवाया।
राजा मानसिंह ने नगरवधुओं को प्रसन्नमन से आमंत्रित किया। इसके साथ ही यह परंपरा चली आ रही है। गणिकाएं इसके जरिए महामसाननाथ से स्वयं को नारकीय जीवन से मुक्ति की कामना करती हैैं। Masannath Temple
















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