bnp news desk । Harish Rana हरीश राणा का नाम आज एक ऐसे इंसान के रूप में लिया जा रहा, जिनके जीवन के 13 साल के लंबे संघर्ष ने न सिर्फ उनके परिवार के धैर्य, सेवा, समर्पण की कठिन परीक्षा ली, बल्कि अब अपने जैसे न जाने कितने लोगों की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
Harish Rana मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के हरीश राणा कभी एक सामान्य, खुशहाल जीवन जीने वाले होनहार छात्र थे। परिवार, पढ़ाई व सपनों से भरी उनकी दुनिया एक हादसे के बाद बदल गई। 2013 में 20 अगस्त को रक्षाबंधन के दिन हरीश ने शाम साढ़े छह बजे अपनी बहन से बात की थी। एक घंटे बाद परिवार खबर मिली कि उनका बेटा पीजी की चौथी मंजिल से गिर गया है।
सिर में गंभीर चोट थी, पर तब परिवार को ऐसा बिल्कुल नहीं लगा कि अब वह कभी उठ नहीं पाएंगे। शुरुआती कुछ महीने उम्मीद व इलाज के बीच बीते। परिवार को भरोसा था कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। डाक्टरों ने भी कुछ समय तक सकारात्मक संकेत दिए।
हरीश राणा का नाम आज एक ऐसे इंसान के रूप में लिया जा रहा, जिनके जीवन के 13 साल के लंबे संघर्ष ने न सिर्फ उनके परिवार के धैर्य, सेवा, समर्पण की कठिन परीक्षा ली, बल्कि अब अपने जैसे न जाने कितने लोगों की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के हरीश राणा कभी एक सामान्य, खुशहाल जीवन जीने वाले होनहार छात्र थे। परिवार, पढ़ाई व सपनों से भरी उनकी दुनिया एक हादसे के बाद बदल गई। 2013 में 20 अगस्त को रक्षाबंधन के दिन हरीश ने शाम साढ़े छह बजे अपनी बहन से बात की थी। Harish Rana
एक घंटे बाद परिवार खबर मिली कि उनका बेटा पीजी की चौथी मंजिल से गिर गया है। सिर में गंभीर चोट थी, पर तब परिवार को ऐसा बिल्कुल नहीं लगा कि अब वह कभी उठ नहीं पाएंगे। शुरुआती कुछ महीने उम्मीद व इलाज के बीच बीते। परिवार को भरोसा था कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। डाक्टरों ने भी कुछ समय तक सकारात्मक संकेत दिए।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, हकीकत सामने आने लगी। हरीश की स्थिति में सुधार नहीं हो रहा था। इलाज लंबा व महंगा था और परिणाम अनिश्चित। परिवार ने अपनी पूरी जमा-पूंजी लगा दी। Harish Rana
बड़े-बड़े अस्पतालों में इलाज कराया, पर हरीश की हालत जस की तस रही। उनकी सांसें तो चल रही थी, पर 2013 से वह जिंदा लाश की तरह बिस्तर पर थे। क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित (शत प्रतिशत दिव्यांग) हरीश का शरीर पूरी तरह निष्क्रिय हो गया था। उनको यूरिन बैग लगा था व नली के सहारे फीडिंग की जा रही थी।
एक ओर पिता की आर्थिक क्षमता ने जवाब दिया तो दूसरी ओर बेटे का असहनीय कष्ट परिवार के लिए देखना मुश्किल हो रहा था।
लगा दी जीवन भर की जमा पूंजी, बेच दिया था घर
हरीश राणा के माता-पिता ने जितना हो सकता था, सब कुछ किया। जीवनभर की जमा-पूंजी उनके इलाज पर खर्च कर दी।
दिल्ली में तीन मंजिला मकान था, जो सितंबर 2021 में बेच दिया। हरीश का इलाज कई बड़े अस्पतालों में कराया। 27 हजार रुपये महीने पर नर्स रखी। 14 हजार रुपये प्रतिमाह फिजियोथेरेपी पर भी खर्च किया। दवाओं का हर महीने का खर्च भी 20 से 25 हजार था।
सरकार से कोई मदद नहीं मिली। वह ताज सेट्स एयर केटरिंग से रिटायर हो चुके हैं व करीब साढ़े तीन हजार रुपये प्रतिमाह पेंशन मिलती है। छोटा बेटा आशीष एक निजी कंपनी में कार्यरत है। हरीश का इलाज कराने के साथ किसी तरह से गुजारा कर रहे थे।
वेट लिफ्टिंग चैंपियन थे हरीश
हरीश 2013 में चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में सिविल इंजीनियरिंग से बीटेक में अंतिम वर्ष के छात्र थे। बाडी बिल्डिंग का शौक रखने वाले हरीश वेट लिफ्टिंग के चैंपियन थे। उन्होंने कई प्रतियोगिताएं भी जीतीं।
जिस दिन दुर्घटना हुई उसके अगले ही दिन वह पंजाब विश्वविद्यालय में होने जा रही वेट लिफ्टिंग की फाइनल प्रतियोगिता में भाग लेने वाले थे।
जिगर के टुकड़े की मौत मांगना नहीं था आसान
हरीश के पिता अशोक राणा व उनकी मां निर्मला देवी के लिए अपने जिगर के टुकड़े की मौत मांगना आसान नहीं था। बेटे का जीवन बचाने के लिए हरसंभव प्रयास किया, पर एक दिन ऐसा भी आया जब उम्मीदें खत्म हो गईं। आर्थिक स्थिति ने जवाब दे दिया।
बेटे को असहनीय पीड़ा में देखना मुश्किल हो गया। दैनिक जागरण से बातचीत में मां निर्मला देवी ने कहा था कि सोचा नहीं था कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि अपने बेटे की लंबी उम्र की नहीं, बल्कि मोक्ष प्राप्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करेंगे।
हादसे के बाद कब क्या हुआ
20 अगस्त 2013 : हरीश राणा की चंडीगढ़ में पेइंग गेस्ट हास्टल की चौथी मंजिल से गिरकर हादसे में गंभीर ब्रेन इंजरी हो गई और वे परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (पीवीएस) में चले गए।
जुलाई 2024 : हरीश राणा के परिवार ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की, पर हाईकोर्ट ने खारिज कर दी।
2025 : परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने प्राइमरी व सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड गठित किए। दोनों बोर्ड ने रिपोर्ट दी कि हरीश की स्थिति स्थिर है व रिकवरी की कोई संभावना नहीं है।
11 मार्च 2026 : सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला व केवी विश्वनाथन की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए भारत में पहली बार परोक्ष इच्छामृत्यु की अनुमति दी।
13 मार्च 2026 : परिवार ने एम्स में हरीश को शिफ्ट करने की तैयारी शुरू की। ब्रह्माकुमारी बहनों ने घर से विदाई दी।
14 मार्च 2026 : हरीश को एम्स दिल्ली के पैलिएटिव केयर यूनिट में शिफ्ट करने का आदेश दिया गया। हरीश को गाजियाबाद में उनके घर से एम्स तक लाया गया।
15 मार्च 2026 : हरीश राणा को घर से एम्स में शिफ्ट किया गया।
मार्च का तीसरा सप्ताह : चिकित्सकों की टीम ने परोक्ष इच्छामृत्यु के प्रोटोकाल को चरणबद्ध तरीके से शुरू किया। फीडिंग ट्यूब व अन्य दूसरे उपकरणों हटाया गया।
24 मार्च 2026 : हरीश राणा ने एम्स में चिकित्सकों की निगरानी में अंतिम सांस ली। Harish Rana
















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