BNP NEWS DESK। Rani Laxmibai झांसी की महारानी वीरांगना लक्ष्मीबाई के काशी में जन्मस्थल व जन्म जयंती वर्ष को लेकर मतभेद एक बार फिर गहरे होते हुए सामने आने लगे हैं। मराठी विद्वान व वरिष्ठ रंग निर्देशक उपेंद्र विनायक सहस्रबुद्धे की हाल में ही प्रकाशित एक पुस्तक ‘काशी की कन्या मणिकर्णिका झांसी की रानी लक्ष्मीबाई’ में दावा किया गया है कि महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म असि के पास भदैनी में नहीं, बल्कि काशी के मणिकर्णिका घाट के पास हुआ था।
Rani Laxmibai इसीलिए उनका नाम मणिकर्णिका और संक्षेप में मनु रखा गया था। उनके जन्म की तिथि भी ज्योतिष के आधार पर मराठी पंचांग के अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी और उत्तर भारतीय पंचांग गणना के अनुसार मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी तदनुसार 18 नवंबर की आधी रात के बाद 12:40 बजे हुआ था।
उल्लेख मिलता है कि जिस दिन उनका जन्म हुआ उस दिन अधिक मास था। इस दृष्टि से महारानी का जन्म 1828 में न होकर 1835 में होने के मत की पुष्टि होती है। मराठी के इतिहासकार राय बहादुर दत्तात्रेय बलवंत पारसनीस ने भी अपनी पुस्तक में जन्मतिथि का उल्लेख 19 नवंबर 1835 ही किया है। सहस्रबुद्धे ने बताया कि तिथियों के संदर्भ में दक्षिण और उत्तर भारतीय गणना में कृष्णपक्ष में एक महीने का अंतर होता है। कार्तिक मास की गणना महाराष्ट्र की तिथि परंपरा से है जो काशी में मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी ही होगा।
मणिकर्णिका तीर्थ क्षेत्र में काठ की हवेली को बताया वास्तविक जन्मस्थली
Rani Laxmibai उपेंद्र विनायक सहस्रबुद्धे ने अनेक प्रमाणों का उल्लेख करते हुए अपनी पुस्तक में लिखा है कि महारानी लक्ष्मीबाई के पिता मोरोपंत तांबे का विवाह चौखंभा स्थित काठ की हवेली में हुआ था। जगन्नाथ शास्त्री तैलंग का कहना है कि लक्ष्मीबाई का जन्म भी इसी काठ की हवेली में हुआ था। कुछ स्थानों पर जन्मस्थान के उल्लेख में ब्रह्मनाल भी आया है।
माता-पिता ने तीर्थ क्षेत्र के नाम पर ही कन्या का नाम मर्णिकर्णिका रखा। उन्होंने बताया कि झांसी के किले पर प्रतिदिन दिखाए जाने वाले लाइट एंड साउंड शो में भी जन्मस्थान मणिकर्णिका ही बताया जाता है। उनका कहना है कि महारानी के बचपन के इतिहास से जुड़े तथ्यों को नष्ट किया जा रहा है। इसमें कोणभट्ट का अखाड़ा, काठ की हवेली और बाजीराव घाट का अस्तित्व नष्ट कर दिया गया।
आज भदैनी क्षेत्र में जिस भूखंड को जन्मस्थान बताया जाता है वहां बिना किसी पुष्ट शोध के नियमों को ताक पर रखकर स्मारक बनवा दिया गया है। उनका कहना है कि स्मारक पर कुछ वर्ष पूर्व क्रांतिकारी तांत्या टोपे के वंशज भी पहुंचे थे, उनका कहना था कि काशी आने पर पहली बार जो जन्मस्थान और स्मारक दिखाया गया था वह स्थान दूसरा था। उनका तर्क है कि मोरोपंत तांबे की पत्नी भागीरथी बाई ने कन्या को मणिकर्णिका तीर्थ के निकट काठ की हवेली में जन्म दिया इसलिए कन्या का नाम मणिकर्णिका बाई रखा गया था। Rani Laxmibai
















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