BNP NEWS DESK। Baikuntha Chaturdashi कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी पर वैकुंठ चतुर्दशी को शैव-वैष्णव एका का भाव दिखेगा। सनातन धर्मावलंबी पर्व विधान अनुसार गंगा स्नान करेंगे और श्रीहरि भगवान विष्णु के चरणों में बिल्व पत्र अर्पित करेंगे तो ‘हर’ के मस्तक पर तुलसी सजाएंगे। श्रीकाशी विश्वनाथ धाम, आदि केशव, बिंदु माधव समेत हरि-हर के देवालयों में श्रद्धा के भाव कुछ इसी तरह ठांव पाएंगे।
भगवान विष्णु काशी के रक्षक रूप में थे
Baikuntha Chaturdashi पौराणिक मान्यता है कि काशी पूर्व भगवान विष्णु की थी। भगवान विष्णु काशी के रक्षक रूप में थे। आदिकेशव घाट पर आदिकेशव मंदिर इसी मान्यता का प्रतीक है। बाद में भगवान शिव की इस आनंद कानन में रहने की इच्छा जान भगवान विष्णु उनके पास पहुंचे और सहस्त्र कमल दल से भगवान शिव की आराधना की, एक कमलदल कम होने पर पुंडरीकाक्ष ने अपनी एक आंख शिवचरणों में समर्पित कर दी और अपनी काशी भगवान शिव को दान कर दी।
शिव ने प्रसन्न हो उनका नेत्र वापस किया और सदा-सदा के लिए काशी में विराजमान हो गए।काशी को भगवान विश्वनाथ को दान करने के पश्चात भगवान विष्णु ने इस आनंद कानन में आ बसे सभी देवताओें से भी वापस अपने-अपने लाेक चलने का आग्रह किया, उनका अनमनापन देख उन्होंने कहा, सभी अपने लिंगरूप में यहां विराज सकते हैं। इस प्रकार पूरी काशी लिंग विग्रहों से युक्त है।
यहां कण-कण में भगवान शिव की व्याप्ति मानी जाती है। एक अन्य मत के अनुसार चातुर्मास के पश्चात योगनिद्रा से जगे भगवान विष्णु इसी दिन भगवान शिव के हाथाें सृष्टि संचालन का दायित्व वापस अपने हाथों में लेते हैं। इस दायित्व हस्तांतरण के अवसर को पूरा ब्रह्मांड बैकुंठ चतुर्दशी के उल्लास के रूप में मनाता हैै। लाेक संरक्षण दायित्व हस्तांतरण हो या भगवान विष्णु द्वारा भगवान शिव को काशी दान की कथा, एक दूसरे को एक-दूसरे की प्रिय वस्तुओं का अर्पण इन्हीं कथाओं के मनोभाव की पुष्टि करती है। Baikuntha Chaturdashi














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