BNP NEWS DESK। Nagari Pracharini Sabha लंबी कोशिशों के बाद नागरीप्रचारिणी सभा के ऐतिहासिक आर्यभाषा पुस्तकालय में सुरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों, हस्तलेखों और पुराने अभिलेखों के संरक्षण और डिजिटाइजेशन का रास्ता साफ़ हो गया है। सभी पांडुलिपियों का स्वत्वाधिकार सभा के पास रहेगा। सभा के विशेषज्ञों की देखरेख में ही जीर्णोद्धार और मेटा डेटा क्रिएशन का काम अगले महीने से शुरु हो जाएगा।
Nagari Pracharini Sabha देश की समृद्ध पांडुलिपि विरासत को संरक्षित और अध्ययन-अध्यापन की मुख्यधारा में ले आने के उद्देश्य से हाल ही में स्थापित संस्कृति मंत्रालय की महत्वाकांक्षी ज्ञान भारतम योजना के अंतर्गत पहले चरण में तेरह आनुषंगिक संस्थाओं के साथ-साथ पाँच स्वतंत्र संगठनों में भी हस्तलेखों के संरक्षण का अभियान एक साथ शुरु किया जाएगा। नागरीप्रचारिणी सभा उन पाँच स्वतंत्र संगठनों में से एक, बनारस की अकेली संस्था है, जिसे इस अभियान में शामिल किया गया है।
इस ख़ुशख़बरी के आरंभिक संकेत तभी मिल गए थे, जब 11 सितंबर की शाम नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित प्रथम अंतरराष्ट्रीय ज्ञान भारतम सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरीप्रचारिणी सभा के ऐतिहासिक महत्व और वहाँ इन दिनों लगातार चल रहे पुनरुद्धार के प्रयत्नों की प्रशंसा की थी। सम्मेलन में 1100 से ज़्यादा विद्वान, विशेषज्ञ और संस्थाएँ शामिल हुए थे।
संस्था के प्रमुख का दायित्व सँभालते ही व्योमेश शुक्ल ने पांडुलिपियों के जीर्णोद्धार की दिशा में कोशिशें शुरु कर दी थीं। इस बीच केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने इस विषय में दिलचस्पी ली और पीएमओ का ध्यान भी इस ओर गया। बैठकों और विचार-विमर्श के कई दौर के बाद राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय के मुक्ताकाशीय मंच पर आयोजित एक भव्य समारोह में संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल और अनेक मूर्धन्य अतिथियों की मौजूदगी में संस्कृति मंत्रालय की ओर से संयुक्त सचिव समर नंदा और सभा के पक्ष से मुख्य प्रशासकीय सलाहकार चंद्राली मुखर्जी ने एमओयू पर हस्ताक्षर किए। Nagari Pracharini Sabha
सभा की पांडुलिपियाँ
सभा ने अपनी स्थापना के समय से ही हस्तलिखित हिंदी और संस्कृत ग्रंथों की खोज का कार्यभार अपने कंधे पर उठा लिया था। 1893 से 1943 के बीच, पचास वर्षों की अवधि में इस खोज के माध्यम से सभा ने दर्जनों अज्ञात कवियों और ज्ञात कवियों के अज्ञात ग्रंथों का पता लगाया। बाबू श्यामसुंदर दास, राधाकृष्णदास, कार्तिक प्रसाद, कृष्ण बलदेव वर्मा, श्याम बिहारी मिश्र, जगन्नाथ दास रत्नाकर, काशीप्रसाद जायसवाल, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, डॉक्टर हीरालाल, पीतांबर दत्त बड़थ्वाल, दौलतराम जुयाल, शंभुनारायण चौबे, वासुदेवशरण अग्रवाल और विश्वनाथ प्रसाद मिश्र जैसे मूर्धन्य विद्वानों की देखरेख में हुई इस खोज के फलस्वरूप हिंदी साहित्य का पूरा मानचित्र ही बदल गया. इसी खोज में प्राप्त पांडुलिपियों के विधिवत पाठ-संपादन के बाद सभा ने सूर, तुलसी, कबीर और जायसी जैसे अमर कवियों की रचनावलियां प्रकाशित कीं और सारे संसार का ध्यान इन कवियों के गौरवशाली काव्य की ओर गया।
नागरीप्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने बताया कि डिजिटाइजेशन के बाद नए युग में एआई, ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन और ब्लॉकचेन जैसी तकनीकों के प्रयोग से शोध, अनुशीलन, संपादन और प्रकाशन में इन पांडुलिपियों का विनियोग हो सकेगा और भारत का प्राचीन ज्ञान नई पीढ़ी तक कहीं आसानी से पहुँच सकेगा। इस दूरगामी योजना के सफल कार्यान्वयन के लिये सभा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति कृतज्ञ है। Nagari Pracharini Sabha








