BNP NEWS DESK। Trijata Temple रामायण कथा में पूरी रामकथा के दौरान सीता हरण के बाद उनकी सुरक्षा में तैनात त्रिजटा राक्षसी के बारे में भी जिक्र है। त्रिजटा सीता के बंदी जीवन के दौरान उनके साथ मौजूद रहीं और रावण के निर्देश पर सीता की देखरेख का जिम्मा उन्हीं का था।
Trijata Temple राक्षसी होने के बाद भी त्रिजटा का चरित्र लंका की अशोक वाटिका में बंधक रहने के दौरान भी सीता के प्रति कठोर नहीं रहा और वह सीता के दुखों की साक्षी भी रही हैं। ऐसे में कई ग्रंथों में त्रिजटा के चरित्र के बारे में भी काफी लिखा गया है।
भोले की नगरी काशी को मंदिरों का शहर कहा जाता है। भगवान शंकर के इस धाम में सभी देवी देवता विराजमान हैं और यहां उनका मंदिर है। देवी देवताओं के इन मंदिरों के बीच बाबा विश्वनाथ के दरबार के करीब त्रिजटा नाम की राक्षसी का मंदिर भी है। इस मंदिर में साल में सिर्फ एक दिन भक्तों की भीड़ होती है। धर्म नगरी काशी में राक्षसी की पूजा के इस विधान का सीधा कनेक्शन त्रेतायुग से है।
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, कार्तिक मास भगवान विष्णु को अति प्रिय है। इस पूरे महीने में भगवान विष्णु संग माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए भक्त काशी में एक महीने तक गंगा स्नान करते हैं। एक महीने स्नान के बाद कार्तिक पूर्णिमा के अगले दिन त्रिजटा राक्षसी के दर्शन और पूजन के बाद ही भक्तों की ये तपस्या पूरी होती है। Trijata Temple
माता सीता ने दिया था वरदान
मंदिर के पुजारी राजा तिवारी ने बताया, ‘माता सीता ने त्रिजटा को वरदान दिया था कि कार्तिक पूर्णिमा के अगले दिन उन्हें भी देवी स्वरूप में पूजा जाएगा।’ बता दें कि त्रेतायुग में जब रावण ने माता सीता का हरण किया था तो उन्हें अशोक वाटिका में उन्हें रखा था। अशोक वाटिका में त्रिजटा नाम की राक्षसी माता सीता की देखभाल करती थी। रावण के वध के बाद जब माता सीता वापस लौट रही थीं, तो उन्होंने त्रिजटा को काशी में विराजमान होने की बात कहकर उन्हें एक दिन की देवी का वरदान दिया था। बस तब से उनकी पूजा होती चली आ रही है। Trijata Temple
चढ़ता है मूली और बैंगन
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, जो भी कार्तिक पूर्णिमा के अगले दिन त्रिजटा राक्षसी की पूजा करता है। त्रिजटा हमेशा उनकी रक्षा करती हैं। यही वजह है कि यहां साल में एक दिन भक्तों की भीड़ लगी होती है और भक्त मूली-बैंगन का भोग लगाकर विशेष रूप से उनकी पूजा करते हैं।






