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Home वाराणसी

इतिहास सुधारें “देश के पहले प्रधानमंत्री नेताजी सुभाष थे”

सुभाष के महान तप से मिली आजादी : इन्द्रेश कुमार

BNPNEWS by BNPNEWS
January 22, 2023
in वाराणसी
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Subhash Mahotsav

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के 126वें जन्मदिन के अवसर पर विशाल भारत संस्थान द्वारा 6 दिवसीय Subhash Mahotsav  का आयोजन किया जा रहा है।

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Bnp  news desk। Subhash Mahotsav नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के 126वें जन्मदिन के अवसर पर विशाल भारत संस्थान द्वारा 6 दिवसीय Subhash Mahotsav  का आयोजन किया जा रहा है। महोत्सव के चौथे दिन सुभाष भवन, इन्द्रेश नगर, लमही में “भारत की आजादी में आजाद हिन्द सरकार के साथ अन्य देशों का योगदान : जापान के विशेष संदर्भ में” विषयक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह आयोजित किया गया।

Subhash Mahotsav संगोष्ठी के मुख्यवक्ता प्रसिद्ध विचारक इन्द्रेश कुमार, मुख्य अतिथि इंडो-इंटरनैशनल बुद्धिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष डा के सिरि सुमेधा थेरो, बीएचयू के सामाजिक विज्ञान संकाय की संकायाध्यक्ष प्रो बिन्दा परांजपे एवं काशी विद्यापीठ के इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो अशोक कुमार सिंह ने संयुक्त रूप से विश्व के पहले सुभाष मन्दिर में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को माल्यार्पण कर एवं दीपोज्वलन कर संगोष्ठी का शुभारम्भ किया।

विशाल भारत संस्थान की बाल आजाद हिन्द बटालियन ने अतिथियों को सलामी दी।

आजाद हिन्द फौज की रानी झांसी रेजीमेंट का औपचारिक गठन किया

3 सितम्बर 1943 को हिनान में 15 हजार व्यक्तियों की उपस्थिति में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने कहा कि “युद्ध के परिणाम से ज्ञात होगा कि विश्व का नेतृत्व कौन सम्भालेगा। ब्रिटेन यदि विजयी हो भी गया तो उसे लाभ कुछ नहीं मिलेगा।

संयुत राज्य को अवश्य इसका फायदा होगा।“ ब्रिटेन तो भारत से निष्कासित हो ही जाएगा। 22 अक्टूबर 1943 को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज की रानी झांसी रेजीमेंट का औपचारिक गठन किया।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के 126वें जन्मदिन के अवसर पर विशाल भारत संस्थान द्वारा 6 दिवसीय Subhash Mahotsav  का आयोजन किया जा रहा है।

उन्होंने कहा “मैं वादा करता हूँ कि अंधेरे और उजाले में, दुख और सुख में, व्यथा और विजय में तुम्हारे साथ रहूंगा। मैं तुम्हें भूख, प्यास, अभाव, प्रयाण पथ और मृत्यु के सिवा कुछ नहीं दे सकता। पर अगर तुम जीवन और मृत्यु–पथ पर मेरा अनुसरण करोगे तो मैं तुम्हें विजय और स्वाधीनता तक ले जाऊंगा। मेरे वीरों तुम्हारा युद्धघोष होना चाहिए दिल्ली चलो, दिल्ली चलो।

आजादी की इस लड़ाई में हममें से कितने बचेंगे, मैं नहीं जानता, पर मैं यह जानता हूँ कि अंत में हम जीतेंगे और जब तक हमारे बचे हुए योद्धा एक और कब्रगाह ब्रिटिश साम्राज्यवाद की बना सके। जब तक दिल्ली के लाल किले पर फतह का परचम लहरा नहीं लेते, हमारा मकसद पूरा नहीं होगा।”

मात्र 5 महीने में सुभाष चन्द्र बोस पूरे पूर्वी-एशिया का दौरा कर चुके थे

12 दिसम्बर 1943 को सुभाष चन्द्र बोस सुरवाया, बोर्नियो, सुमात्रा होते हुए सिंगापुर लौटा आए। मलाया, बर्मा और सिआम में भारतीय प्रवासियों की संख्या सर्वाधिक थी। मात्र 5 महीने में सुभाष चन्द्र बोस पूरे पूर्वी-एशिया का दौरा कर चुके थे।

अंतरिम आजाद हिन्द सरकार के प्रथम प्रदेश, अंडमान–निकोबार का क्षेत्राधिकार ग्रहण करने के लिए सुभाष चन्द्र बोस 29 दिसंबर 1943 को अंडमान पहुंचे। 29 दिसंबर 1943 को जापानियों ने अंडमान निकोबार दीप समूह आजाद हिन्द सरकार को विधिवत रूप से सौंप दिया।

अंडमान को आरजी हुकूमते आजाद हिन्द के अधीन ले लिया। सुभाष ने इनका नाम बदलकर शहीद और स्वराज द्वीप रख दिया। सुभाष ने इन द्वीपों का काम संभालने के लिए ले लोकानाथन को यहां का गवर्नर नियुक्त कर दिया।

3 फरवरी 1944 को आजादी के लिए लड़ने वाली आजाद हिन्द फौज से कहा “खून खून को पुकार रहा है। हमारे पास खोने के लिए वक्त नहीं है। अगर ईश्वर ने चाहा तो हम एक शहीद की मौत मरेंगे। मरते वक्त भी हम उस रास्ते को चूमेंगे जो हमारी सेना को दिल्ली तक पहुंचायेगा। दिल्ली तक जाने वाली यह सड़क आजादी की सड़क है। चलो दिल्ली।

यह सत्य है कि सुभाष होते तो देश कभी न बंटता

मुख्यवक्ता इन्द्रेश कुमार ने कहा कि अखण्ड भारत की आजादी का पूरा खांका सुभाष के पास था। आजाद हिन्द सरकार को जब 10 देशों ने मान्यता दे दी तो सुभाष ने वैधानिक तरीके से भारत को आजाद कराने की शपथ ली।

उन्होंने शपथ लिया था “मैं सुभाष चन्द्र बोस अपने जीवन की अंतिम सांस तक आजादी की पवित्र लड़ाई जारी रखूंगा। मैं सदैव भारत का सेवक रहूंगा और 38 करोड़ भाई-बहनों के कल्याण को अपना सर्वोच्च कर्तव्य समझूंगा।”

नेताजी के इस शपथ ने हिन्दुस्तान को आजादी दिलाई। यह सत्य है कि सुभाष होते तो देश कभी न बंटता। देश के विभाजन से बड़ी क्या त्रासदी हो सकती है। लाखों की हत्या और करोड़ों का बेघर होना आज तक तकलीफ दे रहा है। लाहौर और करांची की याद किसको नहीं आती। भारतभूमि को फिर से एक करके ही सुभाष के सपनों को पूरा किया जा सकता है।

कांग्रेस की सरकार ने आजाद हिन्द फौजियों के नाम तक को मिटा दिया। आजादी दिलाने वाली सेना के इतिहास को ही नहीं खत्म कराया, बल्कि अंग्रजों के साथ मिलकर नीलगंज में हजारों आजाद हिन्द फ़ौजियों का कत्ल करवाकर उसके निशान मिटा दिए। अब इतिहास स्वीकार करने लगा है कि आजाद हिन्द सरकार ने ही वैधानिक रूप से देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराया।

इन्द्रेश कुमार ने कहा कि 30 दिसम्बर 1943 को अंडमान निकोबार में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने झंडा लहराकर अंग्रेजी सामराज्यवाद की ताबूत में कील ठोंक दिया। अब आजाद हिन्द सरकार के पास अपनी जमीन थी और सरकार भी।

आजाद हिन्द सरकार अंग्रजों से मुक्त कराए क्षेत्रों में बन गयी। 14 अप्रैल 1944 को मोईरंग मणिपुर में ब्रिटिश को हराकर भारतभूमि पर मेजर शौकत अली ने आजाद हिन्द सरकार का झण्डा लहराया।

नेता तो हर कोई है पर नेताजी तो सुभाष चन्द्र बोस ही

मुख्य अतिथि डा के सिरि सुमेधा थेरो ने कहा कि आज देश में दो नाम हैं एक राष्ट्रपिता जो 1942 में सिंगापुर से आजाद हिन्द रेडियो से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने महात्मा गांधी के लिये घोषणा की थी। दूसरा नेताजी जिनके जन्मदिवस को भारत ने पराक्रम दिवस के नाम से घोषित किया है। नेता तो हर कोई है पर नेताजी तो सुभाष चन्द्र बोस ही हैं।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय की संकायाध्यक्ष प्रोफेसर बिन्दा परांजपे ने कहा कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ऐसे महान नेता थे जिन्होंने नारी शक्ति को पहचाना और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका तय की।

रानी लक्ष्मी बाई रेजिमेन्ट की जानकारी जापानी स्त्रोतों से मिलती है। लेकिन स्वतंत्र भारत में अब तक इनके इतिहास को सुरक्षित करने का काम नहीं किया गया है। इस विषय पर शोध होना चाहिये।

इतिहास विभाग के प्रोफेसर प्रवेश भारद्वाज ने कहा कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के अन्दर ऐसे अलौकिक शक्ति थी जिसने भारत में ही नहीं विदेशों में भी उनका नाम रौशन किया। भारत जैसे देवभूमि को सिंचित करने के लिये वेद, महाभारत, रामायण, गीता का सहारा लिया।

इसलिये सुभाष बाबू में देवत्व का भाव था। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के पास ऐसी शक्ति थी कि वो हजारों सुभाष चन्द्र बोस को पैदा कर सकते थे।

नेपाली अध्ययन केन्द्र के प्रोफेसर एन०पी० सिंह ने कहा कि आजाद भारत में आर्थिक नियोजन का शब्द पहली बार नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के दिमाग में आया। उनकी प्रमुख चिंता देश की गरीबी को खत्म करने की थी जिसके लिये शॉर्ट टर्म पॉलिसी और लाँग टर्म पॉलिसी जैसे योजनाओं को बनाकर भारत की गरीबी को दूर किया जा सकता है।

राजनीतिक विज्ञान विभाग के प्रोफेसर संजय श्रीवास्तव ने कहा कि सुभाष जी में वो क्षमता थी कि काँग्रेस में रहते हुए गांधी और नेहरू से अलग सोच रखते थे और उस विश्वास के साथ भारत को स्वतंत्रता दिलाना चाहते थे। स्वतंत्रता के इस संघर्ष को उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय आयाम देने का प्रयास किया। सुभाष चन्द्र बोस अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बड़े जानकार थे।

मुगल आक्रांताओं के नाम पर सड़क और बिल्डिंग का नाम क्यों

अध्यक्षता करते हुए महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के इतिहास विभाग के पूर्व विभागध्यक्ष प्रोफेसर अशोक कुमार सिंह ने कहा कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पर स्वामी विवेकानन्द जी का प्रभाव था और सुभाष चन्द्र बोस भारत के अतीत को लेकर बहुत ही गौरवांवित थे,

भारत के भविष्य को लेकर आशांवित थे, लेकिन भारत के वर्तमान स्थिति को लेकर बहुत ही चिंतित थे। मानवता और सेकुलरिजम की गिरी हुई पराकाष्ठा है, जब कंस और रावण के नाम पर एक ईंट नहीं है तो मुगल आक्रांताओं के नाम पर सड़क और बिल्डिंग का नाम क्यों ?

विशाल भारत संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफेसर डा० राजीव श्रीगुरूजी ने कहा कि भारत के इतिहास में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की वजह से देश को आजादी मिली। अब यह सत्य उद्घोषित हो चुका है।

भारत की बेटियों ने नेताजी के नेतृत्व में देश को आजाद कराने में बड़ी भूमिका निभाई थी। आज उनके नाम को गुमनाम कर दिया गया। सरकार से मांग है कि उन बेटियो के नाम को उजागर किया जाए और कक्षा एक से एमए तक नेताजी सुभाष को पढ़ाया जाए, तब देश मे नेताजी का राष्ट्रवाद विकसित होगा।

वरिष्ठ पत्रकार डा० कविन्द्र नारायण श्रीवास्तव को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य सम्मान-2023, आदत्य नारायण इंटर कॉलेज, चकिया के प्रवक्ता डा मुकेश श्रीवास्तव को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान-2023 एवं उत्तर प्रदेश पुलिस के डिप्टी एसपी फूलचन्द कन्नौजिया को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस राष्ट्रीय सुरक्षा सम्मान-2023 से सम्मानित किया गया।

संगोष्ठी का संचालन डा निरंजन श्रीवास्तव ने किया। संगोष्ठी में प्रमुख रूप से अर्चना भारतवंशी, डा मृदुला जायसवाल, नजमा परवीन, डा मोनिका गुप्ता, अशोक कुमार सिंह, कुँअर मुहम्मद नसीम रजा, पूनम सिंह, तपन कुमार घोष, सूरज चौधरी, ओपी सिंह, ओ०पी० पाण्डेय, अजय कुमार सिंह, सुधांशु सिंह, रमन, अंकुर, राहुल, दीपक गोंड, निधि राय, अशोक यादव, लक्ष्मी,

डा धनंजय यादव, ज्ञान प्रकाश जी, अनिल पाण्डेय, हितेन्द्र श्रीवास्तव, डा पवन पाण्डेय, धर्मेन्द्र नारायण श्रीवास्तव, जगदीश पाठक, राजीव कुमार गिरी, विवेक श्रीवास्तव, वेद प्रकाश श्रीवास्तव, ओपी चौधरी, कन्हैया पाण्डेय, देवेन्द्र पाण्डेय, राजेश कन्नौजिया, रत्नेश चौहान, पियूष पाण्डेय, रवीश चन्द्र श्रीवास्तव, डा भोलाशंकर गुप्ता, दीपक आर्य, डा मुकेश प्रताप सिंह, अशोक सहगल, राकेश श्रीवास्तव आदि लोग मौजूद रहे।

The Review

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Subhash Mahotsav नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के 126वें जन्मदिन के अवसर पर विशाल भारत संस्थान द्वारा 6 दिवसीय सुभाष महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

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