BNP NEWS DESK। MLC Election 2026 विधान परिषद की वाराणसी शिक्षक खंड की सीट पर एक बार फिर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। वहीं स्नातक खंड की सीट पर सपा प्रत्याशी ने निर्णायक बढ़त ले ली है। यह हाल तब है जबकि शहरी प्रबुद्ध वर्ग में भाजपा की पकड़ मजबूत मानी जाती रही है और इस क्षेत्र के भाजपा के नेता जोर शोर से समीकरण अपने पक्ष में होने का दावा कर रहे थे। ऐसे में चुनाव का परिणाम उनके लिए चिंता और चिंतन का विषय बन चुका है। इस बार भी सपा की व्यूह रचना तोड़ने में काशी क्षेत्र के भाजपा नेता सफल नहीं हो पाए।
प्रत्याशी चयन में देरी और मतदाता बनाने में सक्रियता की कमी प्रमुख कारण
MLC Election 2026 भाजपा अपनी हार की समीक्षा करेगी ही, लेकिन चर्चाओं में इसके कई कारण सामने आ रहे हैं। सबसे बड़ा कारण है शिक्षक मतदाता बनाने में सक्रियता का अभाव। इस क्षेत्र में वित्तविहीन विद्यालयों के शिक्षकों के बीच कमजोर पकड़ और समीकरणों को सहेजने वाले प्रचार की कमी भी बड़े कारणों में हैं।
इस मामले में सपा के दोनों प्रत्याशी बेजोड़ साबित हुए। एमएलसी रहते वे शिक्षकों के बीच उपस्थिति दर्ज कराने के साथ साथ मतदाता बनाने में विशेष रुचि लेते रहे। सपा प्रत्याशी लाल बिहारी यादव की शिक्षक राजनीति की शुरुआत ही वित्त विहीन शिक्षकों के लिए संघर्ष करने से हुई। वह उस संगठन के महत्वपूर्ण नेता बन गए।
संगठन पर ऐसे काबिज हुए कि एक तरह से एकाधिकार जैसा माहौल बना लिया। काशी क्षेत्र के आठ जनपदों में फैले 20 हजार वित्त विहीन शिक्षकों में से जो मतदाता बने उनमें बड़ी संख्या लाल बिहारी के समर्थकों की है। दूसरी ओर शिक्षक मतदाता बनाने में भाजपा के नेता वैसी सक्रियता नहीं दिखा सके।
काशी क्षेत्र में लगातार दूसरे चुनाव में दोनों सीटों पर निराशाजनक प्रदर्शन
कई नेता तो ऐसे हैं जो अपने स्कूल-कालेजों के शिक्षकों तक को मतदाता नहीं बनवा पाए। ऐसे में उनके प्रचार का क्या असर पड़ा होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। स्नातक सीट से सपा के एमएलसी आशुतोष सिन्हा ने भी अपने हजारों समर्थकों के नाम मतदाता सूची में समय रहते दर्ज करा लिए।
प्रदेश में एमएलसी की 11 सीटों पर हुए चुनाव में भाजपा का दबदबा तो कायम दिख रहा है लेकिन काशी क्षेत्र में लगातार दूसरे चुनाव में दोनों सीटों पर निराशाजनक प्रदर्शन ने सांगठनिक रूप से मजबूत भाजपा की कमजोरियों को उजागर कर दिए है। MLC Election 2026
भाजपा की हार का प्रमुख कारण सपा की रणनीति को पूरी तरह न समझ पाना भी रहा है। चुनाव की तिथि घोषित होने के बाद भाजपा ने प्रत्याशी चयन किया, जबकि सपा ने काफी पहले ही अपने प्रत्याशियों के नाम तय कर दिए थे।
वास्तव में नामांकन दाखिला के समय से भाजपा प्रत्याशी और संगठन में इस चुनाव को लेकर तेजी दिखी जबकि सपा के प्रत्याशी लगभग डेढ़ साल पहले से चुनाव की तैयारी में ही जुटे थे। सपा की जीत में आठों जिलों में हजारों नए मतदाताओं का नाम जोड़वाना आधार बना। प्रचार के दौरान सपा अपने कोर वोटर को सहेजने में कामयाब रही। यूसीसी के मुद्दे को भी उसने खूब प्रचारित किया। MLC Election 2026







