सात साल बाद बन रहा दुलर्भ संयोग, संतान प्राप्ति की कामना लेकर जुटने लगे श्रद्धालु

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Lolark Chhath 2026

BNP NEWS DESK Lolark Chhath 2026 संतान प्राप्ति की कामना से भदैनी स्थित लोलार्क कुंड में स्नान के लिए आस्थावानों के आगमन का सिलसिला जारी है। लोलार्क छठ (लोलार्क षष्ठी) के लिए बुधवार को मध्य रात्रि से ही कुंड में स्नान और दर्शन पूजन का सिलसिला शुरू हो जाएगा। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक इस वर्ष लोलार्क छठ पर सात साल बाद राजयोग और पांच महापुरुष योग का दुर्लभ संयोग बन रहा है। सर्वार्थ सिद्धि योग बनने से इस पर्व पर किए गए स्नान और पूजन का फल कई गुना बढ़ जाएगा।

Lolark Chhath 2026  भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि 16 सितंबर की सुबह 8:55 बजे से शुरू होकर 17 सितंबर की सुबह 10:26 बजे तक रहेगी। उदया तिथि की मान्यता के चलते यह पर्व 17 सितंबर को ही मनाया जाएगा। स्नान का क्रम ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 3:55 बजे से ही शुरू हो जाएगा। सुबह 5:41 से 6:30 बजे तक विजय मुहूर्त रहेगा, जो शारीरिक बाधाओं और शत्रुओं पर विजय दिलाता है।

स्नान और पूजा का सर्वोत्तम मुहूर्त सुबह 6:31 बजे से 10:26 बजे तक रहेगा। हालांकि इसके बाद सूर्यास्त तक दर्शन और स्नान का सिलसिला अनवरत चलता रहेगा। मान्यता है कि जिन दंपत्तियों को संतान सुख नहीं मिल रहा है, वो विधि-विधान से इस कुंड में स्नान करें तो उनकी गोद भर जाती है। इस पर्व पर पूर्वांचल के विभिन्न जिलों के अलावा बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ से भी दंपति संतान कामना को लेकर कुंड में डुबकी लगाने और लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन के लिए आते है।

गोदौलिया मार्ग तक बैरिकेडिंग, छाया के लिए लगाए पर्दे

लोलार्क षष्ठी पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन भी चाक-चौबंद इंतजाम में जुटा है। श्रद्धालुओं की कतार के लिए कुंड से लेकर सोनारपुरा चौराहा से आगे गोदौलिया मार्ग तक बैरिकेडिंग करायी गई है। श्रद्धालुओं को धूप से बचाने के लिए बैरिकेडिंग के ऊपर पर्दे भी लगाए गए है। नगर निगम के अधिकारियों ने साफ- सफाई के लिए भी टीम तैनात की है। वहीं, कुंड की ओर जाने वाली गलियों की भी मरम्मत की गई है। Lolark Chhath 2026

षष्ठी पर सीधे कुंड के जल पर पड़ती है सूर्य की किरणें

लोलार्क कुंड की बनावट ऐसी है कि भाद्रपद षष्ठी तिथि पर सूर्य की किरणें सीधे कुंड के जल पर पड़ती हैं। लोलार्क का शाब्दिक अर्थ ‘चंचल सूर्य’ है।पौराणिक कथाओं के अनुसार सूर्यदेव के रथ का पहिया यहीं धंसा था, जिससे वहां जलधारा फूट पड़ी। पश्चिम बंगाल के कूच विहार के राजा ने यहां स्नान कर चर्म रोग से मुक्ति पाई थी और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति भी हुई थी। Lolark Chhath 2026

फल में सुई चुभोने की भी परंपरा

लोलार्क षष्ठी पर स्नान के बाद एक पंरपरा भी निभाई जाती है। श्रद्धालु कुंड में स्नान करने के बाद फल खरीदते हैं और उसमें सुई चुभोते हैं। इसे सूर्य की किरणों का प्रतीक माना जाता है। Lolark Chhath 2026

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Author: BNPNEWS

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