BNP NEWS DESK। Global map पिछले साढ़े चार सौ वर्षों से दुनिया जिस मानचित्र को अपनाए हुए है, अब वह बदल जाएगा। इसे बदलने की मुहिम चलाई टोगो ने…अफ्रीका महाद्वीप का एक छोटा सा देश। क्षेत्रफल में यह लगभग हिमाचल प्रदेश जितना है। अपने पड़ोसी घाना की तुलना में चर्चा में भी कम ही रहता है। लेकिन, इसने दुनिया के मानचित्र को बदलने का बीड़ा उठाया और इसे संभव भी कर दिखाया। इस मुहिम में उसे अफ्रीका के अन्य देशों का भरपूर सहयोग मिला। नतीजा यह हुआ कि संयुक्त राष्ट्र ने अब दुनिया का नया नक्शा अपनाने को मंजूरी दे दी है।kइससे हकीकत में कोई देश जितना बड़ा होगा, मानचित्र में उसी अनुपात में दिखेगा। टोगो के विदेश मंत्री राबर्ट डुसे का कहना है कि एक निष्पक्ष दुनिया की शुरुआत निष्पक्ष मानचित्र से होती है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वैश्विक मानचित्रों को महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाने वाला ‘करेक्ट द मैप’ प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित कर दिया। टोगो की ओर से पेश और अफ्रीकी संघ के समर्थन वाले इस प्रस्ताव के पक्ष में 164 देश रहे। अकेला विरोध अमेरिका का रहा। एस्टोनिया, जार्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, सर्बिया और यूक्रेन ने मतदान से दूरी बनाई। भारत ने प्रस्ताव का स्वागत करते हुए उसके पक्ष में वोट दिया।
मतदान का विरोध करते हुए अमेरिकी प्रतिनिधि ने कहा कि यह संयुक्त राष्ट्र के काम और मकसद का मजाक उड़ाता है। वैसे यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है, लेकिन अब विभिन्न सरकारें व अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां स्कूलों, मीडिया, डिजिटल प्लेटफार्म और आधिकारिक नक्शों में मौजूदा मर्केटर मानचित्र की जगह समान-क्षेत्रफल वाले नक्शों को बढ़ावा दे सकेंगे। मोटे तौर पर दुनिया के मानचित्र में अब भारत का नक्शा बड़ा दिखेगा। अफ्रीका व दर्जनों अन्य देशों का नक्शा भी सही तरीके से सामने आएगा। वर्तमान नक्शे में कई देशों को भौगोलिक विस्तार के मुताबिक जगह नहीं मिलती है।
अफ्रीका में विभिन्न संगठन अप्रैल 2025 से मर्केटर नक्शा बदलने के लिए अभियान चला रहे हैं। अफ्रीकी संघ ने उसी साल अगस्त में इस अभियान का समर्थन किया और अपने 55 सदस्य देशों से स्कूलों और सार्वजनिक बातचीत में ‘इक्वल अर्थ मैप’ अपनाने का आग्रह किया। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए टोगो ने शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव पेश कर दिया, जिसे अफ्रीकी संघ के अन्य देशों का समर्थन मिला।
ग्रीनलैंड से बड़ा होने के बावजूद अफ्रीका छोटा दिखाया जाता है
मर्केटर नक्शे में दुनिया की तस्वीर सही तरीके से सामने नहीं आती। सोलहवीं सदी में शिपिंग करने वालों के लिए बना नक्शा बनाने का यह तरीका ध्रुवों के पास के इलाकों को बड़ा और भूमध्य रेखा के पास के महाद्वीपों को छोटा दिखाता है। नतीजा यह कि ग्रीनलैंड से अफ्रीका 14 गुणा बड़ा होने के बावजूद नक्शे में उससे छोटा दिखाया जाता है। अमेरिका और कई पश्चिमी देश मानचित्र पर वास्तविक क्षेत्रफल से ज्यादा विशाल खंड की तरह उभरते हैं, जबकि अफ्रीका, दक्षिण एशिया का आकार छोटा व सिकुड़ा कर पेश किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र से पारित प्रस्ताव में कहा गया है कि यह विकृति दुनिया की असंतुलित छवि बनाती है।
किसी देश का क्षेत्रफल नहीं बढ़ेगा
नई पहल से किसी देश का भौगोलिक क्षेत्रफल नहीं बढ़ने जा रहा। फर्क यह होगा कि समान-क्षेत्रफल वाले नक्शों पर भारत और दक्षिण एशिया यूरोप व उत्तरी अमेरिका के मुकाबले ज्यादा वास्तविक अनुपात में दिखेंगे। कक्षाओं और समाचारों में देश का भौगोलिक चित्रण छोटा नहीं लगेगा। भारत ने साफ किया कि है कि वह ऐसे नक्शे का समर्थन करता है जो महाद्वीपों का आकार सही दिखाए। संयुक्त राष्ट्र स्थित भारतीय मिशन के प्रथम सचिव रघु पुरी ने कहा कि नक्शे यह करते हैं कि समाज भूगोल और दुनिया के पैमाने को कैसे समझता है। इसलिए भारत प्रस्ताव का स्वागत करता है। इसे किसी एक मानचित्र निर्माण पद्धति का समर्थन नहीं समझा जाना चाहिए।
वर्तमान मानचित्र का विरोध क्यों
न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार, हर मानचित्र में आकार या दूरी जैसी चीजों से समझौता करना पड़ता है। किसी गोल चीज को बिना खींचे, सिकोड़े या फाड़े आप उसे सपाट नहीं कर सकते। मर्केटर नक्शा सही दिशा तो बताता है, लेकिन जमीन के हिस्सों का आकार गलत तरीके से दिखाता है। आलोचकों का तर्क है कि मर्केटर मानचित्र एक तरह का भेदभाव उत्पन्न करता है। इसमें दुनिया के कुछ सबसे अमीर राष्ट्र समेत उत्तरी देशों को बड़ा दिखाया जाता है, जबकि भूमध्यरेखीय इलाके छोटे दिखाए जाते हैं। इनमें ज्यादातर विकासशील देश शामिल हैं। कुछ मानचित्र विशेषज्ञों का कहना है कि यह यूरोप-केंद्रित और औपनिवेशिक नजरिये को बढ़ावा देता है।
अफ्रीका ने कहा-यह नैरेटिव का मामला
मर्केटर नक्शे को हटाने के अभियान से जुड़े संगठन ‘अफ्रीका नो फिल्टर’ ने बताया कि दुनिया के मानचित्रों में अफ्रीका का आकार छोटा दिखाना सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी नहीं है। यह नैरेटिव का मामला है। हमारा अभियान अफ्रीका के बारे में दुनिया की सबसे लंबी गलत सूचना और दुष्प्रचार को रोकने की कोशिशों का हिस्सा है। केन्याई भूगोलविद किओको मुएंदो का कहना है कि मर्केटर मानचित्र ने अप्रत्यक्ष तौर पर अफ्रीका महाद्वीप के विशाल संसाधनों, जनसंख्या और निवेश के अवसरों को कम करके आंका है।
1569 में बनाए नक्शे से चल रहा था काम
मर्केटर मानचित्र का दुनियाभर में बड़े पैमाने पर उपयोग होता आया है। इसे यूरोपीय मानचित्र निर्माता जेरार्डस मर्केटर ने 1569 में बनाया था। यह समुद्र में रास्ता तय करने और जहाजों के नेविगेशन के लिए बहुत उपयोगी है। लेकिन, गोल धरती को सपाट नक्शे पर दिखाने की वजह से इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार अपने अनुपात से अलग नजर आने लगता है।
2018 में बनाए गए नए मानचित्र में क्या है
2018 में मानचित्र निर्माताओं बोजन सावरिक, बर्नहार्ड जेनी और टाम पैटरसन ने ‘समान पृथ्वी मानचित्र’ बनाया था। इसमें जमीन के हिस्सों को सही अनुपात में दिखाने के लिए सीधी रेखा वाली दिशाओं को छोड़ दिया गया। आयत के बजाय इसमें पृथ्वी के गोल आकार को ध्यान में रखते हुए किनारे गोल रखे गए हैं। यह महाद्वीपों के आकार को अधिक सटीक रूप से दर्शाता है।







